जब भी आईने के सामने खड़े होते हैं, तोह उम्र की बारीकियां चेहरे पर साफ़ नज़र आती हैं, पर जाने क्यों उन बदलावों से डर नहीं लगता, वहशत नहीं होती , बस एक हलकी सी मुस्कराहट चेहरे पर आ जाती है क्योंकि उस एक पल में एहसास होता है की हमने ज़िन्दगी को जीते जीते कितने मुकाम हासिल कर लिए, कितने रिश्तों को जी लिया और कितना ठहराव से उनको निभाना आ गया।
हाँ नमी अब भी आँखों में जल्दी आ जाती है, हंसी आज भी बेवजह निकल जाती है, अपनों से रूठने की आदत में आज भी हम ही हार जाते हैं पर कुछ अपनों के संग पल बिताने की लालसा ज्यादा हो गयी है, पता है की सादगी और शर्म अब भी लिबास से गयी नहीं है पर फिर भी शख्सियत में एक संजीदगी आ गयी है। और यही ठहराव अक्सर मुझसे कहता है...
कुछ धड़कन पीछे छूट गयीं, कुछ सासें अब भी बाकी
है
कुछ तेरी मेरी बातों की यादें अब भी बाकी
हैं....
कुछ लड़कपन पीछे छूट गया, कुछ बचपन अब भी बाकी है
कुछ खेलो में, हार जीत का फैसला अब भी बाकी है
....
कुछ शिकवे पीछे छूट गए, कुछ शिकायतें अब भी बाकी
हैं
कुछ दरमियाँ आई दूरी का मिटना अब भी बाकी है...
कुछ मौसम पीछे छूट गए, कुछ पत्झढ़ अब भी बाकी हैं
कुछ जीते जीते मरने की इच्छा अब भी बाकी है...
कुछ एहम पीछे छूट गया, कुछ समर्पण अब भी बाकी है
कुछ खुदा के आगे सजदे में झुकना अब भी बाकी है
.....
कुछ तेरा आना बाकी है, कुछ मेरे जाना बाकी है
कुछ तुझमे-मुझमे एक दूजे का हिस्सा अब भी बाकी
है...

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